साइंस को किताबों तक नहीं, एक्सपेरिमेंट और क्यूरियोसिटी से जोड़ने की कोशिश
People of Jaipur सिटी रिपोर्टर }साइंस को सिर्फ किताबों और नोट्स से नहीं, बल्कि देखकर और समझकर सीखना चाहिए। प्रो. वाई.के. विजय पिछले कई वर्षों से इसी सोच पर काम कर रहे हैं। उनकी कोशिश है कि छात्र साइंस को सिर्फ एग्जाम का सब्जेक्ट नहीं, बल्कि एक्सप्लोर करने वाली चीज के रूप में देखें। स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी में इंटरनेशनल फेलोशिप के दौरान उन्होंने देखा कि वहां छात्रों को सवाल पूछने, एक्सपेरिमेंट करने और खुद सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसी अनुभव ने उनकी सोच को नई दिशा दी। विदेश में अवसर होने के बावजूद वे भारत लौटे, ताकि यहां के छात्रों तक अपनी सीख पहुंचा सकें। 43 साल के टीचिंग और रिसर्च करियर में प्रो. विजय राजस्थान यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर, विवेकानंद ग्लोबल यूनिवर्सिटी में वाइस चांसलर और वर्तमान में आईआईएस (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी), जयपुर के सेंटर फॉर इनोवेशन इन साइंस टीचिंग के डायरेक्टर रहे हैं। उन्होंने 300 से अधिक रिसर्च पेपर, 150 से ज्यादा कॉन्फ्रेंस पेपर प्रकाशित किए, 500 से अधिक इनवाइटेड लेक्चर दिए और 40 पीएचडी स्कॉलर्स का मार्गदर्शन किया। उनकी शुरुआती रिसर्च एडवांस्ड न्यूक्लियर तकनीकों और मटेरियल्स में मौजूद सूक्ष्म डिफेक्ट्स पर केंद्रित रही। 1970 और 80 के दशक में उन्होंने राजस्थान यूनिवर्सिटी में पॉजिट्रॉन बेस्ड मटेरियल कैरेक्टराइजेशन फैसिलिटी स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। बाद में उनका काम रिन्यूएबल एनर्जी और हाइड्रोजन स्टोरेज मटेरियल्स तक पहुंचा। हालांकि प्रो. विजय खुद को सबसे पहले साइंस एजुकेटर मानते हैं। पढ़ाते समय उन्हें लगा कि कई कॉन्सेप्ट्स छात्रों के लिए सिर्फ किताबों तक सीमित रह जाते हैं। इसी सोच ने उन्हें लो-कॉस्ट मॉडल्स विकसित करने के लिए प्रेरित किया। उनके शुरुआती मॉडल्स में मैग्नेट वाला पेंडुलम और स्टील बॉल्स से बना क्रिस्टल स्ट्रक्चर मॉडल शामिल हैं। उनकी ‘प्ले, एंजॉय एंड लर्न’ सोच के तहत अब तक 50 से अधिक वर्किंग मॉडल तैयार किए जा चुके हैं। इन मॉडल्स पर आधारित साइंस गैलरी देशभर के 75 से ज्यादा स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, रिसर्च सेंटर और साइंस म्यूजियम में स्थापित की जा चुकी हैं। प्रो. विजय मानते हैं कि साइंस की शुरुआत जवाब याद करने से नहीं, सवाल पूछने से होती है। रिटायरमेंट के बाद भी वे वर्कशॉप्स, साइंस डेमोंस्ट्रेशन और एजुकेशनल आउटरीच प्रोग्राम्स के जरिए छात्रों और शिक्षकों से जुड़े हुए हैं।
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